Success Story: गाजियाबाद के आकर्षक ‘मटके’ की विदेशों में बढ़ी डिमांड, पढ़िए सफलता की कहानी

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रिपोर्ट- विशाल झा

गाजियाबाद: नवरात्रों में इस्तेमाल होने के बाद खराब पड़े ‘मटके’ को देखकर कौशांबी में रहने वाले अभिषेक के दिमाग में एक आइडिया आया. उस एक आइडिए ने अभिषेक की कला की पहचान ना सिर्फ देश बल्कि विदेशों में बढ़ा दी है. इसके साथ ही करीब परिवारों को रोजी रोटी भी मिलने लगी है. दरअसल अभिषेक ने खराब मटकों पर भारत की पुरानी कलाकृति को दर्शना शुरू कर दिया. इसके लिए अभिषेक मटकों पर पेंटिंग बनाने लगे. पेंटिंग हो जाने के बाद यह मटके आकर्षित गमले में तब्दील हो गए. जिसकी भी नजर इन रंग-बिरेंगे गमलों पर जाती वो उसे खरीदने इच्छा रखने लगा. इन मटकों में विलुप्त होती जा रही मंजूषा आर्ट और मशहूर मधुबनी आर्ट को दर्शाया जाता है. इसके अलावा भी विभिन्न रंग बिरंगे पैटर्न को मटको में बनाया जाता है. इन मटको में अगर खरीदार चाहे तो अपना नाम भी लिखवा सकता है.

भारत की कला का विदेशों में प्रचार
अभिषेक द्वारा बनाए गए मटके की देश के साथ-साथ विदेशों से भी डिमांड आनी शुरू हो गए. अभिषेक की कला के कारण भारत की कलाकृति और संस्कृति विदेशों में अलग तरीके से पहचान बनाने लगी है. news 18 local से बात करते हुए अभिषेक बताते हैं कि 2 हजार से अधिक गमले विभिन्न देशों में भेज चुके हैं. इन मटकों की पेंटिंग की खासियत है कि यह पानी पड़ने पर भी खराब नहीं होती. विदेशों में इन गमलों की कीमत 10 गुना ज्यादा हो जाती है. विदेशों में स्विट्जरलैंड, पुर्तगाल, जर्मनी, रूस, यूक्रेन, कनाडा और अमेरिका में एक से डेढ़ हजार रुपए में यह गमले बिक जाते हैं.

महिलाओं को मिला रोजगार
अभिषेक बताते हैं कि गमलों पर पेंटिग्स बनाने के लिए सबसे पहले तो दिल्ली, नोएडा और गाजियाबाद में रहने वाली महिलाओं को ट्रेनिंग दी गई. मधुबनी आर्ट और मंजूषा आर्ट के साथ-साथ दशकों पहले जो कलाकृति मंदिरों पर बनाई जाती थी उसको भी बनाने की ट्रेनिंग दी गई. अब करीब 80 महिलाएं नियमित रूप से 5 से 10 घड़े या मटकों पर पेंटिंग बना रही हैं. यहां काम करने वाली महिलाएं 250 से 500 रुपये तक रोजाना कमा रही हैं. इन गमलों को कपड़े के थैले में पैक किया जाता है. गमलों को पैक करने वाली खोल भी इन्हीं महिलाओं के द्वारा सिला जाता है.

कुम्हारों के खिले चेहरे
आमतौर पर इन मटकोंं को किसी पूजा या फिर त्योहारों के समय पर ही खरीदा जाता है. कोरोना काल की मार झेल चुके कुम्हारों के पास काम धंधा लगभग ठप पड़ा हुआ है. ऐसे में इन मटकों की बिक्री से कुम्हारों की भी रोजी रोटी चल जाती है.

अभिषेक गाजियाबाद और हरियाणा (बल्लभगढ़) के लगभग 50 कुम्हारों से 20 से 50 रुपये में (साइज के अनुसार) मटको को खरीद लेते हैं. जिस पर बाद में आकर्षित पेंटिंग की जाती है.

Tags: Art and Culture, Ghaziabad News, Navratri festival, UP news

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