National Cinema Day: समानांतर सिनेमा के दौर में व्यावसायिक रूप से सफल फिल्में

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पंद्रह साल पहले मैं हिंदी में समानांतर सिनेमा के प्रेणता, फिल्म निर्देशक, मणि कौल से उनकी फिल्मों के बारे में बात कर रहा था. उन्होंने बातचीत के बीच बेतकल्लुफी से मुझसे कहा था- ‘मुझसे ज्यादा एक्सट्रीम में बहुत कम लोग गए. जितनी फिल्में बनाई, सारी फ्लॉप!’ यह बात मेरे मन में अटक गई. मणि कौल की फिल्मों की चर्चा देश-विदेश के सिनेमा प्रेमियों के बीच आज भी होती है, पर पिछली सदी के 70-80 के दशक में जब वे फिल्में बना रहे थे, तब उनकी फिल्में सिनेमाघरों में रिलीज नहीं हुई.

21 वीं सदी में अनुराग कश्यप, हंसल मेहता, दिवाकर बनर्जी जैसे निर्देशकों के यहां व्यावसायिक और कला फिल्मों के बीच की रेखा धुंधली हुई है. आज विभिन्न भारतीय भाषाओं के कई फिल्म निर्देशकों की फिल्मों पर मणि कौल का असर है. ओटीटी प्लेटफॉर्म और इंटरनेट पर उनकी फिल्में (आषाढ़ का एक दिन, दुविधा आदि) खूब देखी जा रही हैं. उस दौर में ये फिल्में फिल्म समारोहों में तो दिखाई गई, लेकिन आम दर्शक इसे नसीब नहीं हुए.

वर्ष 1969 में मणि कौल की फिल्म ‘उसकी रोटी’, बासु चटर्जी की ‘सारा आकाश’ और मृणाल सेन की ‘भुवन सोम’ ने भारतीय फिल्मों की एक नई धारा की शुरुआत की जिसे समानांतर या न्यू वेव सिनेमा कहा गया. फिल्मकार और समीक्षक चिदानंद दास गुप्ता इस धारा की फिल्मों को ‘अनपापुलर फिल्म’ कहते थे. इस धारा की फिल्मों ने भारतीय सिनेमा को कई बेहतरीन अभिनेता दिए.

मुख्यधारा का सिनेमा हमेशा से ही बड़ी पूंजी की मांग करता है और वितरक प्रयोगशील सिनेमा पर हाथ डालने से कतराते रहते हैं. वर्ष 1969 में ही ‘फिल्म फाइनेंस कॉरपोरेशन’ (फिल्म वित्त निगम) ने प्रतिभावान और संभावनाशील फिल्मकारों की ‘ऑफ बीट’ फिल्मों को कर्ज देकर सहायता पहुंचाने का निर्देश जारी किया था. इसका लाभ मणि कौल, मृणाल सेन, बासु चटर्जी जैसे निर्देशक उठाने में सफल रहे. इसी दौर में हिंदी के अतिरिक्त क्षेत्रीय भाषाओं मसलन, मलयालम, बांगला, कन्नड़ आदि में भी कई बेहतरीन फिल्मकार उभरे जिनकी फिल्में दर्शकों के सामने एक अलग भाषा और सौंदर्यबोध लेकर आई.

समानांतर सिनेमा से जुड़े फिल्मकारों के लिए 70 और 80 का दशक मुफीद रहा. पर ऐसा भी नहीं कि इस दौर की सारी फिल्में ‘दर्शकों से दूर’ रही. इस दौर में कई ऐसी फिल्में बनी जो कलात्मक और व्यावसायिक दोनों ही कसौटियों पर सफल कही गई.

हिंदी के रचनाकार राजेंद्र यादव के उपन्यास ‘सारा आकाश’ पर जब बासु चटर्जी ने पहली फिल्म बनाई, तो वह उनकी पहली व्यावसायिक रूप से सफल फिल्म भी साबित हुई. मध्यवर्गीय परिवार की इस यथार्थवादी कहानी को समीक्षकों के साथ-साथ दर्शकों ने भी खूब ने पसंद किया. इसी तरह उत्पल दत्त अभिनीत ‘भुवन सोम’ भी सफल रही. इन फिल्मों की कलात्मक और व्यावसायिक सफलता ने हिंदी सिनेमा के निर्देशकों को प्रयोग करने, नए विषयों को टटोलने के लिए प्रोत्साहित किया.

एफटीआईआई, पुणे से प्रशिक्षित होकर निकले हिंदी के फिल्मकार कुमार शहानी, केतन मेहता, अडूर गोपालकृष्णन (मलयालम), गिरीश कसरावल्ली (कन्नड़), जानू बरुआ (असमिया) और के के महाजन जैसे कैमरामैन ने भारतीय सिनेमा की इस धारा को समृद्ध किया. लेकिन कई ऐसे नाम भी थे जो एफटीआईआई से बाहर थे, जैसे कि श्याम बेनेगल. उनकी फिल्में व्यावसायिक रूप से सफल होने के साथ ही विभिन्न फिल्म समारोहों में पुरस्कृत भी हुई. श्याम बेनेगल ने फिल्म बनाने के लिए फिल्म वित्त निगम से ऋण नहीं लिया था. उनकी पहली फिल्म ‘अंकुर (1974)’ और दूसरी फिल्म ‘निशांत (1975)’ को ‘ब्लेज एडवरटाइजिंग’ ने वित्तीय सहायता दी थी, जबकि तीसरी फिल्म ‘मंथन (1976)’ गुजरात के दुग्ध सहकारी संस्था के सदस्यों की सहायता से बनी. यह तीनों ही फिल्में व्यावसायिक रूप ले सफल रही.

व्यावसायिक रूप से बेनेगल की फिल्मों की तुलना मलयालम फिल्म के निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन से की जा सकती है, जिनकी अधिकांश फिल्में ‘बाक्स ऑफिस’ पर भी सफल रही. उनकी पहली फिल्म ‘स्वयंवरम’ (1972) को चार राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल हुए. इसी तरह एलिप्पथाएम’, ‘अनंतरम’, ‘मुखामुखम’, ‘कथापुरुषन’ आदि भी कलात्मक रूप से उत्कृष्ट और विचारोत्तेजक हैं, जिसे देश-विदेश में कई पुरस्कार मिले.

हिंदी सिनेमा की बात करें तो देश विभाजन की पृष्ठभूमि पर बनी एम एस सथ्यू की ‘गर्म हवा (1973)’, गोविंद निहलानी की ‘आक्रोश (1980)’, ‘अर्धसत्य (1983)’ और केतन मेहता की ‘मिर्च मसाला (198)’ भी व्यावसायिक रूप से सफल कही जाएंगी. इन यथार्थपरक फिल्मों में सामाजिक-सांस्कृतिक तत्वों को कलात्मक रूप से समाहित किया गया.

आखिर में, कन्नड़ भाषा में समानांतर सिनेमा का सूत्रपात करने वाली फिल्म ‘संस्कार (निर्देशक, पट्टाभिराम रेड्डी, 1970)’ के बारे में इस फिल्म के मुख्य अभिनेता गिरीश कर्नाड क्या कहते हैं, उस पर एक नजर डालते हैं. अपनी किताब ‘दिस लाइफ एट प्ले’ में उन्होंने लिखा है: ‘पूरी फिल्म 95 हजार रुपए में बन गई थी. न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर इस फिल्म ने अच्छा प्रदर्शन किया, बल्कि उस साल का बेस्ट फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार- स्वर्ण कमल, से भी नवाजा गया.’

असल में, समानांतर सिनेमा के दौर में महज कुछ हजार रुपए में फिल्में बन रही थी. इसमें ‘स्टार’ नहीं होते थे. कम बजट की इन फिल्मों का लागत कम होने की वजह से उसकी भरपाई हो जाती थी. साथ ही कई फिल्मों से मुनाफा भी हो जाता था. समानांतर सिनेमा को हम कलात्मक मूल्यों की वजह से ही देखते-परखते हैं. इन फिल्मों की व्यावसायिक सफलता हम आज की या उस दौर में बनी मुख्यधारा की फिल्मों से नहीं कर सकते.

Tags: Bollywood, Cinema, Hindi movies



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