22 साल पहले कैसे हुआ कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव जब सोनिया के खिलाफ उतरे जितेंद्र प्रसाद

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हाइलाइट्स

राजीव गांधी की हत्या के बाद गांधी परिवार कई सालों तक सियासत से अलग रहा
सोनिया पर लगातार कांग्रेस में आकर उसमें सक्रिय होने की गुहार कांग्रेसी कर रहे थे
केसरी को हटाने के बाद सोनिया को पार्टी संभालने की जिम्मेदारी सौंपी गई

जून 1991 में लिट्टे के आत्मघाती बम हमलावर के हाथों पति और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद कुछ साल तक गांधी परिवार देश की सक्रिय राजनीति से अलग रहा. कई सालों तक गांधी परिवार कांग्रेस की राजनीति में उस तरह सक्रिय नहीं रहा जिस तरह से 70 के दशक के बाद उसकी भूमिका हो चुकी थी. हालांकि कांग्रेसी नेता तकरीबन रोज ही सोनिया गांधी के आवास पर जाकर उनसे कांग्रेस के मामलों में दखलंदाजी करने की गुहार लगाते थे.

तब पीवी नरसिंहराव प्रधानमंत्री भी थे और कांग्रेस के अध्यक्ष भी. धीरे धीरे उन्होंने कांग्रेस संगठन पर अपनी गिरफ्त मजबूत करनी शुरू कर दी थी. लेकिन ये वो साल भी थे जब केंद्र में सरकार होने के बाद भी कांग्रेस अंतकर्लह का शिकार भी थी और उसमें दो गुट साफ तौर पर बन चुके थे. एक नरसिंहराव और दूसरा उनका विरोधी, जो गांधी परिवार के साथ होने का दावा करता था.

इस दौर में तकरीबन रोज ही असंतुष्ट कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के पास पहुंचकर उनसे पार्टी की गतिविधियों में सक्रिय होने का अनुरोध करते थे. पार्टी कई राज्यों में विधानसभा चुनाव हार चुकी थी. लोकसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी के अध्यक्ष 1997 में सीताराम केसरी जरूर बने लेकिन पीवी नरसिंहराव का खेमा कांग्रेस में हावी था. सीताराम केसरी पार्टी में अध्यक्ष का चुनाव जीतकर इस पद पर बने थे.

हालांकि ये वो दौर भी था कि जब सोनिया गांधी को महसूस होने लगा था कि गांधी परिवार को अनदेखा किया जाने लगा है. अगर जेवियर मोरी की किताब रेड रोज की मानें तो सोनिया गांधी पति की हत्या के बाद भारतीय राजनीति में कतई शामिल होने की इच्छुक नहीं थीं लेकिन गांधी परिवार के मूल्यों और विरासत को जरूर बचाए रखना चाहती थीं. हालांकि दिल्ली में विदेश से आने वाले गणमान्य अतिथि अगर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से मिलने के अलावा सोनिया गांधी से भी मिलने जाते थे.

तब सोनिया ने सक्रिय राजनीति में आने की घोषणा की

फिर 1997 में एक समय ऐसा आया जबकि सोनिया गांधी को लगने लगा कि उन्हें अब कांग्रेस की राजनीति में आना ही होगा. 27 दिसंबर 1997 को वह पहली बार कांग्रेस के दिल्ली के अकबर रोड स्थित मुख्यालय अकबर रोड पहुंचीं और उन्होंने वहां पार्टी की सदस्यता आवेदन को भरा. वापसी में उनके पास पार्टी का मेंबरशिप कार्ड था. अगले दिन कोलकाता में पहली बार सोनिया गांधी सार्वजनिक तौर पर एक सभा में पेश होकर राजनीति में आने की घोषणा की.

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कांग्रेस में आखिरी बार सही मायनों में चुनाव वर्ष 2000 में हुआ था. तब जितेंद्र प्रसाद को हराकर सोनिया पार्टी की अध्यक्ष बनीं थीं. फिर वह वर्ष 2017 तक इस पद पर सर्वसम्मति से अध्यक्ष बनती रहीं. (फाइल फोटो)

केसरी को अध्यक्ष पद से हटाया गया

इसके बाद कांग्रेस में तेज बदलाव होने लगा. केसरी का विरोध बढ़ रहा था. हालांकि उन्होंने चालाकी से सशर्त इस्तीफे की पेशकश की थी लेकिन सोनिया के सक्रिय होने के बाद कांग्रेस में कार्यकारी समिति की बैठक बुलाई गई . 05 मार्च 1998 में केसरी को पार्टी की कार्यकारी समिति की बैठक में अध्यक्ष पद से हटा दिया गया. 06 अप्रैल 1998 को अध्यक्ष की भूमिका सोनिया गांधी को सौंप दी.

कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव की बारी

वर्ष 2000 में कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव की घोषणा की गई. आमतौर पर आजादी के दो दशकों तक तो पार्टी में चुनाव का रिवाज था लेकिन इंदिरा गाधी के पार्टी तोड़ने के बाद से बनी नई कांग्रेस में ये रिवाज करीब खत्म हो चला था. इंदिरा जब तक जिंदा रहीं तब तक वो प्रधानमंत्री भी रहीं औऱ पार्टी अध्यक्ष भी बनी रहीं. यही राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के दौरान हुआ.

पिछले 05 दशकों में पार्टी ने केवल दो बार ही अब तक चुना्व से अध्यक्ष पाने का काम किया है. पहली बार 1997 में जब सीताराम केसरी ने इस चुनाव में शरद पवार और राजेश पायलट को हराया. उसके बाद वर्ष 2000 में ये दूसरा चुनाव था.

कांग्रेस नेता जितेंद्र प्रसाद ने नामांकन के आखिरी दिन सोनिया के खिलाफ अध्यक्ष पद की दावेदारी ठोंकी. उन्हें नाम वापस लेने का बहुत दबाव पड़ा लेकिन वह राजी नहीं हुए.

जब कांग्रेस के केंद्रीय चुनाव अथारिटी ने अध्यक्ष के चुनाव की घोषणा की तो उम्मीद थी कि सोनिया गांधी सर्वसम्मति से ये चुनाव जीतेंगी, उनके खिलाफ शायद ही कोई उम्मीदवार मैदान में आए. 09 नवंबर 2000 को चुनाव होने की सूरत में वोटिंग होने का दिन तय हुआ था.

आखिरी दिन नामांकन करके जितेंद्र प्रसाद ने सनसनी फैला दी

नामांकन के आखिरी दिन जब 29 अक्टूबर को शाहजहांपुर से सांसद जितेंद्र प्रसाद ने आखिरी दिन उम्मीदवारी का पर्चा भरा तो पार्टी में सनसनी फैल गई. उन पर न केवल यूपी प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने नाम वापसी का दबाव डाला बल्कि पार्टी में कई हलकों से ये प्रयास हुए लेकिन जितेंद्र टस से मस नहीं हुए.

जितेंद्र प्रसाद की मुख्य धारा की सियासी यात्रा की शुरुआत 1970 में यूपी विधान परिषद में चुने जाने के बाद हुई थी. इसके बाद वह 80 और 84 के चुनावों में शाहजहांपुर से सांसद चुने गए. प्रदेश के प्रतिष्ठित और सभ्रांत ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाले जितेंद्र प्रसाद एक जमाने में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के दौरान उनके राजनीतिक सलाहकार और करीबी थे.

कभी राजीव के करीबी थे

इसके बाद वह पीवी नरसिंहराव के प्रधानमंत्री बनने पर उनके राजनीतिक सलाहकार ही नहीं बने बल्कि उनके विश्वासपात्र हो गए. उन्हें 1994 में राज्यसभा में भेजा गया था और इसके बाद 1999 में उन्होंने शाहजहांपुर से फिर लोकसभा का चुनाव बड़े अंतर से जीता था. अब जबकि जितेंद्र प्रसाद ने सोनिया के खिलाफ अध्यक्ष पद के चुनाव में दावेदारी ठोंकी तो ये भी माना गया कि उन्हें पीवी नरसिंहराव कैंप से शह मिल रही है.

जितेंद्र प्रसाद का समर्थन अभियान

जितेंद्र प्रसाद ने चुनाव में समर्थन हासिल करने की शुरुआत चेन्नई के पास पेरा्म्बदूर के उस स्मारक स्थल से की, जहां राजीव की हत्या हुई थी. हालांकि जब वह चेन्नई एय़रपोर्ट पर उतरे तो उन्हें स्वागत करने के लिए एक भी कांग्रेसी नेता नहीं पहुंचा. उन्होंने पूरे देश का दौरा किया.

चुनाव में गड़बड़ी का आरोप भी लगाया

दौरा करने के दौरान उन्होंने चुनावों में गड़बड़ी की आशंका भी जताई. ये भी कहा कि ये चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी नहीं होंगे क्योंकि प्रदेश कांग्रेस कमेटियों के पास जो डेलिगेट्स की लिस्ट है, वो सही नहीं बल्कि बोगस है, उसमें गड़बड़ियां हुई हैं. हालांकि कांग्रेस ने उनके आरोपों पर कोई ध्यान नहीं दिया.

सोनिया एकतरफा तरीके से जीतीं

29 अक्टूबर को वोटिंग के दिन देशभर में कांग्रेस की सभी प्रदेश इकाइयों में जोरशोर से वोटिंग हुई. हालांकि ये तो तय था कि सोनिया ही चुनाव जीतेंगी लेकिन जितेंद्र प्रसाद कितने वोट हासिल करेंगे, ये जरूर कौतुहल था. मतगणना में सोनिया को 7448 वोट मले तो प्रतिद्वंद्वी को 94 वोट.

चुनावों के महज दो महीने बाद ही जितेंद्र प्रसाद की दिल्ली में अचानक बीमारी से मृत्यु हो गई. उनके बेटे जतिन प्रसाद फिर शाहजहांपुर से लोकसभा का चुनाव जीते. कांग्रेस के तेजतर्रार युवा नेताओं में शामिल हुए. वह मनमोहन सरकार के दूसरे टर्म में केंद्रीय मंत्री भी बने. एक साल पहले ही उन्होंने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी की सदस्यता ले ली. फिलहाल वह यूपी में योगी सरकार में मंत्री हैं.

Tags: All India Congress Committee, Congress, Congress President, SHASHI THAROOR, Sonia Gandhi

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