खेतड़ी राजा अजीत सिंह न होते तो विवेकानंद भी नहीं होते विवेकानंद! 129 साल पहले दोस्ती ने रचा बड़ा इतिहास

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रिपोर्ट – इम्तियाज़ अली

झुंझुनूं. ‘भारतवर्ष की उन्नति के लिए मैंने जो कुछ किया, वह मैं नहीं कर पाता यदि राजा अजीत सिंह मुझे नहीं मिलते.’ स्वामी विवेकानंद की यह बात आपने कहीं न कहीं पढ़ी होगी, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह राजा अजीत सिंह कौन थे और विवेकानंद की प्रतिष्ठा में उनका योगदान कितना बड़ा था? आज से 129 साल पहले सितंबर 1893 को अमेरिका के शिकागो में हुई विश्व धर्म संसद में भारत के ज्ञान व संस्कृति का परचम लहराने वाले स्वामी विवेकानंद के अमेरिका जाने का पूरा खर्च तो अजीत सिंह ने उठाया ही था, लेकिन उनकी व्यक्तिगत पहचान और छवि के पीछे भी खेतड़ी के राजा ही थे.

11 से 27 सितंबर 1893 के बीच शिकागो में धर्म संसद हुई थी. इसमें भाग लेने के लिए पहुंचे स्वामी विवेकानंद की यात्रा की कहानी बड़ी दिलचस्प रही. खेतड़ी राजा अजीत सिंह के कहने पर उनके सचिव मुंशी जगमोहन लाल ने विवेकानंद के लिए 31 मई 1893 को ओरिएंट कम्पनी के पैनिनशुना नामक जहाज़ में प्रथम श्रेणी का टिकट खरीद कर दिया था. मुंबई से सवार होकर वह 63 दिनों में शिकागो पहुंचे थे. एक रोचक फैक्ट यह भी है कि शिकागो संसद में भाग लेने के बाद विवेकानंद सीधे खेतड़ी आए थे और नौ दिन यहां रुके थे.

ज़िंदगी में तीन बार खेतड़ी आए विवेकानंद

खेतड़ी के राजा अजीत सिंह व स्वामी विवेकानंद मित्र थे. राजस्थान से अजीत ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे, जिनका विवेकानंद के साथ गहरा नाता रहा. इसी लगाव के चलते विवेकानंद अपने जीवन काल में तीन बार खेतड़ी आए. तीनों प्रवास को मिलाकर देखें तो वह करीब चार माह खेतड़ी में रहे. शिकागो धर्म संसद में जाने से पहले भी वह खेतड़ी में थे और संसद में भाग लेने के बाद भी यहीं आए थे.

नाम और छवि भी खेतड़ी से ही मिली

विवेकानंद नाम से पूरी दुनिया में मशहूर होने के बाद यह रहस्य भी खुला कि उनका यह नाम खेतड़ी राजा अजीत सिंह के सुझाव पर ही रखा गया. खेतड़ी आने से पहले उनका नाम विविदिषानंद था. यह नाम राजा को उच्चारण में सही नहीं लगा तो उन्होंने विवेकानंद नाम दिया. आपको यह भी बताएं कि विवेकानंद के पांच नाम याद किए जाते हैं: बचपन का नाम नरेन्द्र, कमलेश, सच्चिदानंद, विविदिषानंद और विवेकानंद. लेकिन सबसे ज्यादा चर्चित वह खेतड़ी से मिले विवेकानंद नाम से ही हुए.

लू से बचने के लिए राजा ने ही सुझाया साफा

स्वामी विवेकानंद ने शिकागो की सर्वधर्म महासभा को जिस पोशाक यानी चोगा और पगड़ी पहनकर संबोधित किया, वह राजा अजीत सिंह की ही देन थी. खेतड़ी के गर्म मौसम में लू से बचने के लिए सिर पर साफा बांधने की परंपरा थी. यहां विवेकानंद को तेज गर्मी में असुविधा होती थी इसलिए अजीत सिंह ने उन्हें साफा बाधने की सलाह दी थी. विवेकानंद ने इसे स्वीकार कर लिया. बाद में यही साफा बांधकर वह शिकागो धर्म संसद में गए और उसके बाद से दुनिया भर में उनकी यही छवि स्थापित हो गई.

Tags: History of India, Swami vivekananda



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